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एक अन्य सच मेरे भारत का !

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An other true fact of my India

An other true fact of my India

एक अन्य सच मेरे भारत का ! यह मैंने देखा इलाहाबाद के सरस्वती घाट पे जहा माँ दुर्गा की पूजा के बाद उन्हें यमुना जल में वित्सर्जन करने की प्रक्रिया चल रही थी !
बहुत सारे लोग माँ दुर्गा के पूजा अर्चना बड़ी ही विधि विधान के बाद उन्हें ये आखरी विदाई दे रहे थे ! जो निश्चय ही उन सब की बड़ी ही सची निष्ठा का प्रतिक है .
पर वही एक दूसरा सच जानने को मिला . जहा बहुत ही छोटे छोटे बच्चे कचरे के उन ढेर से कुछ कीमती वस्तु निकलने की होड़ में थे ताकि उसे बेच के अपनी भरन पोषण कर सके .
ये काम वो हजारो लोग के मध्य कर रहे थे जहा जिले के बहुत बड़े बड़े प्रशासनिक अधिकारी भी उपस्थित थे ,स्वास्थ सेवा से जुड़े अधिकारी भी उपस्थित थे , पर किसी ने उन्हें ये समझाने की कोशिश नहीं किया या बताने का प्रयास भी नहीं किया की ये सब आप के स्वास्थ लिए हानिकारक है .
इसी को दुसरे अंश से देखा जाये तो जहा हमारा भारत २०२० तक विकशित देश होने का सपना सजोया है क्या वह पूरा हो पायेगा ????????
आप सब जानते है ये मेरा भारत देश है जहा सब संभव है …. बस कहने भर की देरी है .की हम विकशित देश के निवासी है …….
इससे क्या होगा जब तक बच्चों को सही शिक्षा और उनके स्वास्थ को ध्यान न दिया जाये ………????????
जो कल के भविष्य है उन्हें आज का ही पता नहीं वो भारत निर्माण कैसे करेंगे ???????????

(अमरेश बहादुर सिंह )
Amresh Bahadur Singh

कृपया सैर करे मेरा.घुमक्कड़.शास्त्र .ब्लॉगस्पोट.कॉम

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16 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

syeds के द्वारा
October 16, 2011

अमरेश जी, हम सभी के लिए यह सच बहुत कड़वा है…क्या हम सब के लिए ऐसा मुमकिन नहीं की हफ्ते में सिर्फ एक दिन या एक घंटे इस तरह के लोगों के लिए काम करें? हमारे ख्याल से अगर हर आदमी जो इस काबिल है हफ्ते में सिर्फ एक घंटे भी काम करे इस चीज़ अपर तो बड़ा अंतर पैदा होगा… http://syeds.jagranjunction.com

    Amresh Bahadur Singh के द्वारा
    October 16, 2011

    आपका दिल से शुक्रिया… प्रिय सैयद जी आप ने जो विचार रखा है वो निसंदेह प्रशंसा योग्य है ……….

    Amresh Bahadur Singh के द्वारा
    October 16, 2011

    अगर हर आदमी जो इस काबिल है हफ्ते में सिर्फ एक घंटे भी काम करे तो यह सत्य है की …….. हम एक स्वाछ भारत ………. एक शिक्षित भारत …….. और एक महान भारत का निर्माण करेंगे …… जो निश्चय ही एकता और भाईचारे का मिशाल कायम करेगा …………….

Santosh Kumar के द्वारा
October 14, 2011

प्रिय अमरेश भाई ,.नमस्कार भारत का हर सच अब बहुत कडुवा होता जा रहा है ,..इंडिया के बोझ तले दबा भारतवर्ष ….यही हकीकत है ,..बहुत आभार http://santo1979.jagranjunction.com/

    Amresh Bahadur Singh के द्वारा
    October 14, 2011

    प्रिय संतोष भाई जी ….. नमस्कार ! सच बहुताधिक कडुवा होता ….. ये कडुवा जहर भी कभी कभी सर झुका के पीना पड़ता है ..

    Amresh Bahadur Singh के द्वारा
    October 14, 2011

    जैसे आप ने कहा………… इंडिया के बोझ तले दबा भारतवर्ष ……………. ये भी एक कडुवा सच जो हम सर झुका के स्वीकार कर लेते है ……………..

bharodiya के द्वारा
October 13, 2011

अमरेश भाई नमस्कार बधाई आपको । आलोचना तो होनी ही चाहिये । अहलुवालियाय संक्रुति में जीनेवाले विकास प्रेमीयों की आंख खुलेगी ।

    bharodiya के द्वारा
    October 13, 2011

    अमरेशभाई मेरी टाईपिंग भूल सुधार लो । आप के नाम के आगे –अ– टाईप नही हुआ है ।

    Amresh Bahadur Singh के द्वारा
    October 13, 2011

    भरोदिया जी ,, नमस्कार…… बहुत बहुत बधाई हो आपको भी …….ऐसे आलोचनात्मक पोस्ट में मेरा पूर्ण सहयोग देने के लिए …….

    Amresh Bahadur Singh के द्वारा
    October 13, 2011

    संस्कृति को आगे बढाना बहुत अच्छी बात है … पर मानवता और अपनी जिम्मेदारियों को भी बखेरना अपनी ही जिमेदारी है . और शिक्षा से प्राप्त ज्ञान का भी सही इस्तेमाल करना चाहिए ………………….. यही हम सब का कर्तब्य भी है ………..

nishamittal के द्वारा
October 13, 2011

अमरेश जी ये दृश्य प्राय तीर्थस्थानों व आयोजनों के बाद दीखता है,जिसको देखकर मन को पीड़ा पहुँचती है,अच्छी पोस्ट.

    Amresh Bahadur Singh के द्वारा
    October 13, 2011

    आदरणीय निशा जी नमस्कार ! आप ने हमारे भावनाओ को समझा यह जान कर मन को बहुत शांति मिली …

    Amresh Bahadur Singh के द्वारा
    October 13, 2011

    आदरणीय निशा जी नमस्कार ! आप ने हमारे भावनाओ को समझा यह जान कर मन को बहुत शांति मिली …tf

    Amresh Bahadur Singh के द्वारा
    October 13, 2011

    निशा जी जो सच होता वो खुद ही मन से फुट पड़ता है … पर ऐसे सच को जन कर भी हम कुछ नहीं कर सकते है .. पीड़ा पहुँचती है, यह सब देख कर …………

    bharodiya के द्वारा
    October 13, 2011

    नीशा बेहन ऐसे द्रष्य बिना आयोजन के भी मिलते हैं । और वो रोज का होता है । आयोजनवाला तो एक दिन का होता है । आप शादी ब्याह मे देखो तो थोडा अलग दिखता है, थोडी मानवता आ गयी है तो बचा हुआ खाना हाथों हाथ दिया जाता है, लेकिन बात वही है ।

    Amresh Bahadur Singh के द्वारा
    October 13, 2011

    भरोदिया जी , सही कहा आपने , लोगो में अब कुछ तो मानवता आ गयी है … जो हाथो हाथ बचा हुआ दे देते है …. नहीं तो फेके हुए ढेर से वो ले जाते है ……….


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