Amargyan

सच जो सामने दिखाई दे ...

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वो पत्थर दिल क्यो बेचैन हैँ …

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आज लगता है मै ही गलत हू …
जो बचपन से ही किसी ग्रुप को लाइक नही करता था ।।

अकेले ही अपने कदम चाल के मस्ती मेँ …
मस्त था ।।

किताबे कहती थी मै सुनता था …
जब कभी भावुक हो जाता था …

तो उसके रंग मे रग जाता था …
उससे निकले शब्दो के सार को फिर संजोकर मैँ रख लेता था …

मैँ यह भालीभाति जानता हू …
ये बाते केवल मेरे दिल को चोट और बहुत चोट पहुचाती है …।।

जो मेरे गिरते हुए ग्राफ का एक बडा कारण है …
पर क्या करे दोस्त …

वो पत्थर दिल का एक टुकटा आज भी कही मेरे बाडी मे छुपा हुआ है …
जो ना चाह के भी उस र्दद का एहसास करता है ..

मेरी तडप जायज है पर वो पत्थर दिल क्योँ बेचैन हैँ …
पर वो पत्थर दिल क्यो बेचैन हैँ …

*******

मैँ जानता हू मेरी खता क्या है …
दिल टुटने कि वजह क्या है …

ये मेरी बदनसीबी कह लो …
या उनका हाईटेक नजरिया कहलो …

प्यार के हर ताने हर कामेँट मैँने सहे है …
फिर भी …

अभी तक दुनिया के नजरो से मैँने उन्हेँ बचा के रखा हैँ …
फिर भी …

अभी तक दुनिया के नजरो से मैँने उन्हेँ छिपा के रखा हैँ …

**********

उन्हेँ क्या पता ये भाव मेरे दिल के …
जो निकलती है गंगा के पवित्र जल की तरह …
मानो तो वो मेरे प्रेम शब्द है …
ना मानो तो वो फेक वर्ल्ड से बढ. कर कुछ भी नही …

*************
वो जो कहती थी
वो कितना सच है
या मेरा दिल समझता है
या उनका इमान जनता है …
क्या क्या गुजर रहा है मेरे दिल पे
ये या तो मैँ जानता हू या उनका दिल जानता है …
सोचा था वो मेरी खामोशी को जुबान देँगी …
पर वो खुद खामोश निकली ….

************
अमरेश बहादुर सिंह
(Amresh Bahadur Singh)
visit this link ……….meraghumakkadshastra.blogspot.in



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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

December 4, 2012

रोचकता से भरपूर प्रस्तुति के लिये आभार

    Amresh Bahadur Singh के द्वारा
    December 4, 2012

    डॉo हिमांशु शर्मा जी, आपका बहुत बहुत आभार,,,,,

yamunapathak के द्वारा
December 3, 2012

बहुत सुन्दर.

    Amresh Bahadur Singh के द्वारा
    December 3, 2012

    आदरणीया यमुना जी, सादर अभिवादन…… आपके इस कमेंट से मेरा मन बाग-बाग हो गया……

yogi sarswat के द्वारा
December 3, 2012

वो जो कहती थी वो कितना सच है या मेरा दिल समझता है या उनका इमान जनता है … क्या क्या गुजर रहा है मेरे दिल पे ये या तो मैँ जानता हू या उनका दिल जानता है … सोचा था वो मेरी खामोशी को जुबान देँगी … पर वो खुद खामोश निकली …. मित्रवर अमरेश जी बहुत खूब लिखा है आपने ! बहुत सुन्दर शब्द

    Amresh Bahadur Singh के द्वारा
    December 3, 2012

    योगी जी आपके इस अनमोल कमेंट के लिए आप का बहुत बहुत धन्यवाद …..

yatindranathchaturvedi के द्वारा
December 2, 2012

रोचक,

    Amresh Bahadur Singh के द्वारा
    December 3, 2012

    यतीन्द्र नाथ जी आपका बहुत बहुत आभार……

Amresh Bahadur Singh के द्वारा
December 2, 2012

आदरणीय सुषमा जी आप के इस कमेंट के लिए बहुत बहुत धन्यवाद …. सुषमा जी आप कविता के लाइनों में ही रह गयी …. उसके अन्दर कुछ और भी है जिसे शायद आप ने मिस कर दिया ……………..

Sushma Gupta के द्वारा
December 1, 2012

प्रिय अमरेन्द्र जी, आपकी पूरी कविता पढकर तो ऐसा लगा कि आपकी इस सुन्दर रचना का शीर्षक ”वो पत्थर -दिल क्यों वेचैन नहीं है ,होना चाहिए. कविता की अंतिम लाइने इसकी पुष्टि कर रहीं हैं .. सोचा था वो मेरी खामोशी को जुवान देंगी .. पर वो खुद खामोश निकलीं ..साभार ..

shalinikaushik के द्वारा
December 1, 2012

amresh जी बहुत सुन्दर शब्दों में भावों को अभिव्यक्त किया है aapne

    Amresh Bahadur Singh के द्वारा
    December 2, 2012

    शालिनि कौशिक जी सबसे पहले आप को बहुत बहुत धन्यवाद …. कौशिक जी दिल से लिखे शब्द के भाव शायद अच्छे ही होते है …..


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